सेमल पर बसंत

अरुणिता
द्वारा -
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लुढक गया है चाँद

उतर कर धीरे धीरे

खपरैलों पर

झोपड़ी की झिरकी से

बिखरी गयी है

क्षीण आभा

सोयी आदिम बाला

खदानों से लौट

कर हाड़तोड़ श्रम

तपते बदन से टकराकर

पिघल गयी है चाँदनी

श्यामवर्ण तन

बेखबर है पसरा

आंगन में खड़ा सेमल

साक्षी है पुजारी सा

सुलगते से अंगार

फूलों से लकदक

लाल लाल रश्मि

करवट लेती

सुघड़ यौवना

मांदल की थाप सी

सांसों की थिरकन

मंद मंद बयार

गिरते सेमल फूल

अर्चना में उंडेलते हुऐ

ताल मिलाता सा

अनजान सा संगीत

दबी चिनगारियों में

फूटता सैलाब

तन का उच्छवास

उष्ण का आगमन

फैलता उजास

बीतता ऋतुराज

सेमल पर

लुटता हुआ बंसत

वी . पी . दिलेन्द्र

रिसर्च स्कालर

राजस्थान विश्वविद्यालय

जयपुर, राजस्थान

 

 

 

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