दस्तावेज

अरुणिता
द्वारा -
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       मां को जाना था चली गई । सब ने शांति की सांस ली। विशेष रूप से बेटू और उसकी पत्नी मानसी प्रसन्न थी क्योंकि उसके सपनों को पंख लग गए थे और सफलता कुछ ही कदम की दूरी पर थी । एक आलीशान 6 कमरों वाली कोठी, कोठी के सामने बड़ा सा मखमली हरा लोन ,तरह-तरह के पेड़ पौधे, लोन में झूला, प्रकाश स्तंभ- दो मेन गेट पर  और 2 कोठी के प्रवेश द्वार पर। ऐसे ही मृदुल सपने जाने कब से उसकी आंखों में पल रहे थे लेकिन मां इन सपनों के बीच रोड़ा बनी थी ।उन्हीं के रहते उनके सपनों में रंग नहीं भर पा रहे थे ।बड़ी खीज होती। उन्हें लगता कि मां सारे धन पर कुंडली मारे बैठी है ।किसी को कुछ बताती भी नहीं है और ना ही किसी से कुछ मांगती है । बेटू ने लाख उगलना चाहा लेकिन मां चुप्पी साध गई ।अधिक जिद करने पर कहती-

       "बेटू तू व्यर्थ की जिद ना कर जो बात तेरे जानने की नहीं है हमेशा उसी को जानने के लिए जिद्द क्यों करता है? मैं तुझसे कोई उम्मीद तो नहीं रखती।"

     "  मां यदि तुम मुझे बता दोगी तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा ?क्या मैं कुछ छीन लूंगा ?तुम्हें अपने बेटे पर विश्वास नहीं है।"

   "   हां नहीं है तुम मुझे परेशान मत करो।

      " नहीं करूंगा तुम मेरे साथ चलो ।यहां अकेली रहती हो ।कल कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन देखेगा।?"

      "  जो बात हुई ही नहीं तू उसकी चिंता क्यों करता है और ऊंच-नीच तो कहीं भी हो सकती है। तू क्या घर में बैठा मेरी रखवाली करता रहेगा? इतने अपने लोग हैं यहां कोई भी संभाल लेगा ।रमेश और उसकी बहू मेरा बड़ा ध्यान रखती है।"

      " अपनों से ज्यादा गैरों पर यकीन करती हो?"

       " जहां अपने नहीं होते वहां गैरभी अपनों से ज्यादा अपने हो जाते हैं।"

     मां बहस पर उतर आतीं।थक कर बेटू को चुप रह जाना पड़ता।एक दिन बेटू बोला-" मां,सुमित इस कोठी के एक करोड़ दे रहा है। इससे ज्यादा भी कोई क्या देगा?चालीस साल पुरानी तो हो ही गई है।बेचनी तो पड़ेगी ही।घर की दीवारों से चूना झड़ने लगा है।मरम्मत चाहिए।अब पूना से बार-बार तो आया नहीं जा सकता।"

       "तुझे बार-बार आने के लिए कहता कौन है।क्यों अपना समय और पैसा बर्बाद करता है।तो इस बार निश्चय करके ही आया है कि कोठी बेचकर ही जायेगा।पर मैंने तुझसे कहा था कि मेरे रहते कोठी नहीं बिकेगी।मैं अपनी छत क्यों दूं?"

      "इसलिए कि मैं अपनी छत डलवा लूं।"

      "क्या गारंटी है कि तू अपनी छत बना लेगा।कल मैं भी बिना छत के हो जाऊंगी।आज मेरे पास एक ठिकाना तो है। कहने को अपना घर है।दुख्खम-सुख्खम चुपचाप पड़ी तो हूं।तू अपनी छत अपनी मेहनत से डलवा।ये तेरे पिताजी की कमाई की है।वो तो चले गए।क्या अब इसे भी जाने दूं।तू नहीं समझेगा। मुझे इससे अपने प्राणों से भी ज्यादा मोह है।यह मेरा घर ही नहीं मेरा सुरक्षा कवच भी है। मुझे यहां बड़ी शांति मिलती है।"

        "मां तुम अपनी ज़िद्द नहीं छोड़ोगी?"

      "नहीं,छोड़ भी देती यदि तूने जमीन का टुकड़ा भी खरीदा होता।तब मुझे लगता कि तू गम्भीरता से मकान बनाने की दिशा में बढ़ रहा है।बीस साल हो गए तुझे कमाते। तुझसे एक जमीन का टुकड़ा नहीं खरीदा गया।"

      "मां कुछ बचता ही नहीं।"

       "यह तेरी सिरदर्दी है।बचाना चाहेगा तभी कुछ बचेगा न। नहीं तो वहां परदेश में पड़ा क्या कर रहा है। यही लौट आ।"

       भिन्ना उठा बेटू और फिर कभी न लौटने की कसम खाकर चला गया।उस दिन से मां ने भी किसी से उम्मीद करना छोड़ दी। अपनी अकेली दुनियां में आप जीने लगीं।मन समझा लिया कि जिनके बेटा बेटी नहीं होते वे क्या मर जाते हैं।कुछ दिन के लिए जीवन में ठहराव सा आ गया।मन थोड़ा अशांत भी रहा। लेकिन जीवन फिर से अपनी राह पर चलने लगा।

     शांत प्रकृति की शांता व्यर्थ के आडम्बरों से दूर अपनी दुनियां में मस्त रहती थीं।ज्यादा शोरगुल ज्यादा बातचीत उन्हें कभी नहीं सुहाती थी।उनके पति श्यामलाल भी उन्हीं की रह शांत प्रकृति के थे।उन्हें लगा कि वे जीवन भर अपने लिए ही ओढ़ती बिछाती आईं हैं।जिस समाज ने उन्हें सम्मान,घर परिवार दिया उसके प्रति भी उनका कुछ फर्ज बनता है।अब कोई जिम्मेदारी भी नहीं है। थोड़ा वक्त भी है।यही सोच कर उन्होंने एक एनजीओ की सदस्यता लें ली और बच्चों को हस्तशिल्प का प्रशिक्षण देने लगीं।बेकार पड़े सामान से वे काम की चीजें बनवा लेतीं।यह शौक उंन्हे बहुत पहले से था। उन्हें पता ही न लगा कि वक्त कैसे खिसक रहा है।

        धीरे धीरे शांता अशक्त होने लगीं। उन्होंने एनजीओ तक जाना छोड़ दिया।घर पर ही बच्चों को सिखाने लगीं। कुछ अतिरिक्त आमदनी भी हो जाती।वरना पति द्वारा छोड़े पैसों से ही काम चलातीं। बूंद बूंद रिसने से भरा घड़ा भी खाली हो जाता है।यही चिंता उन्हें भी थी।वे फूंक फूंक कर कदम रखती। खूब मितव्ययता से रहतीं। पर जरुरतमंद की सहायता जरुर  करतीं।ये जीवन भी उन्हें रास आ रहा था।

        कभी कभी बेटी समिधा उनके पास आ जाती,या वे वहां चलीं जाती। समिधा ज्यादा दूर नहीं थी।इस बार समिधा आई तो मां को मोबाइल खरीदकर, पैसे डलवाकर चलाना भी सिखा गई।जरुरी नंबर भी उसमें फीड कर दिए।

       अब शान्ता यानि मां के लिए और भी आसानी हो गई।फोन करके ही जरुरत पड़ने पर प्लम्बर या इलैक्ट्रिशियन को बुलवाउ लेतीं।न स्वंय दौड़ना पड़ता और न किसी पड़ोसी को परेशान करना पड़ता।किराने का सामान भी फोन पर ही लिखवा देती। नौकर सामान रखकर पैसे लेकर चला जाता। समिधा के साथ साथ और भी रिश्तेदारों से बात कर लेतीं।यानि टूटते सम्पर्क फिर जुड़ गए।

      समिधा कुछ पोस्टकार्डों पर पते लिखकर और दो चार बार पैन भी मां की अलमारी में रख आई और कह गयी कि बीच-बीच में आती रहूंगी। पुत्र के कारण जो परेशानी दिमाग पर छा गई थी वो पुत्री का सहारा पाकर दूर हो गई।वक्त अपनी गति से चलने लगा। समिधा महीने में एक बार मोबाइल रिचार्ज करा देती।

      काफी समय से समिधा को मां का फोन नहीं मिला और न कोई पत्र ही आया।वह अपनी तरफ से मिलाती तो फोन स्विच आफ आता।सोचती मां शायद

चार्ज करना भूल गयीं हैं।क ई बार सोचा कि जाकर मां के हालचाल पता कर आऊं,पर चाहकर भी अपनी गृहस्थी के काम धंधे से निकल नहीं सकी।वह रिश्तेदारों को फोन कर मां की कुशलता लेती रहती।

       मां इन दिनों ज्यादा व्यस्त हो गयीं। उन्हें हमेशा पुत्र का भय लगा रहता।रोज ही अख़बार में ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि पुत्र ने सम्पत्ति के लिए पिता का गोली मारी थी। मां और भाई को गंडासे से काट दिया।बेटू की नीयत पर उन्हें हमेशा शक रहता।बेटू के आने पर वे बेशक बोल्ड बनीं रहतीं,पर अंदर ही अंदर बेटू से भय भी खातीं।पता नहीं बेटू कब क्या कर दें?ये नहीं कि वे बेटू से प्यार नहीं करती थीं लेकिन प्यार का मतलब ये नहीं कि वे समय असमय बेटू की गालियां खाएं।

       उनका मन भी उसकी तरफ से हटने लगा था, लेकिन वे अपनी मनःस्थिति किसी पर प्रकट न करतीं। हां इन दिनों उन्होंने वकील से मिलकर अपनी चल अचल सम्पत्ति की वसीयत कराई।बैंक में जितने भी खाते या फिक्स डिपोजिट थे सब में समिधा को नोमिनी बनाया। समिधा को पैसे की जरूरत थी और उसके पास कोई भी अर्निंग मेम्बर नहीं था।धैर्य जब गर्भ में था संयम तभी एक दुर्घटना में चल बसे थे और समिधा अपना संघर्ष आप कर रही थी। समिधा का दुःख उन्हें चैन से बैठने न देता।वे अपने मन की बात केवल समिधा से ही कह सकतीं थीं।अभी भी उसकी मदद करती रहतीं।

       बेटू हमेशा इसी ताक झांक में रहता कि मां अपना सब कुछ बेटी को न पकड़ा दे और वह हाथ मलता ही रह जाए। इसलिए समस्त सम्पत्ति अपने नाम कराने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाता रहता।ऐसा नहीं कि वे कुछ समझती नहीं थीं।बेटू में तो इतना भी अपनापन न था कि कभी बहन का दुःख सुख बांट पाता या कोई मदद ही करता।

      वे उसकी लालची प्रवृत्ति से परिचित थीं। उन्होंने अपनी सोचों की भनक किसी को न लगने दी।वे वसीयत बनवाकर और समिधा को नोमिनी बनाकर निश्चिंत हो गई।यदि वे चलीं भी गयीं तो समिधा को कोई परेशानी नहीं होगी।उसका जीवन आराम से कट जाएगा।

        अभी बैंक से लौटकर सुस्ता ही रहीं  थीं कि कालबेल घना उठी। उन्होंने उठकर दरवाजा खोला। सामने बेटू खड़ा था।

     "तू इस समय.....?"उसे अचानक सामने पाकर वे अचम्भित हो गई।

     "क्या मैं आ नहीं सकता?"

      "क्यों नहीं आ सकता?पर जब भी आता है फोन करके आता है।"

      "मां, दिल्ली काम से आया था ।सोचा आपसे भी मिल लूं।"

       "अच्छा किया।चल अंदर बैठ।"शांता उसे अंदर ले आई।

     तभी अचानक एक दिन चाची कि फोन आया-"समिधा , दीदी नहीं रहीं। पिछले दिनों से दीदी की तबियत ढ़ीली चल रही थी। हमने बेटू को भी फोन कर दिया है।"

      सुनकर समिधा सन्न रह गई। मां ऐसे कैसे जा सकती है। मां के साथ ऐसा कुछ जरुर घटा है जिसे मां ने किसी को नहीं बताया या बताने का मौका ही नहीं मिला।

अब समिधा कहां रुकने वाली थी।बेटू से पहले उसे वहां पंहुचना था।

       समिधा सूचना मिलने के दो घंटे में ही वहां पंहुच गई। उसके पंहुचने से पहले ही आसपास के रिश्तेदार आ गये थे। मां को देखकर समिधा फूट फूट कर रोने लगी।आज मां ही नहीं रहीं।उसका मायका ही समाप्त हो गया। दुःखी मन से मां के पास बैठी समिधा को अचानक याद आया। मां रोज डायरी लिखा करती थीं। उसने मां की अलमारी खोलकर डायरी निकाल ली और सबसे अंतिम पृष्ठ निकाल कर पढने लगी।उस पर दो दिन पहले की तारीख पड़ी थी। मां ने लिखा था-

      "आज बेटू आया है। उसने जैसे सारा गुस्सा थूक दिया है। बड़े प्यार से मिला है।घर का सामान भी लाया है।प्रेम पूर्वक कुशल क्षेम भी पूंछी है।बाहर से गाजर का जूस लाया है।उसको दो गिलासों में डाला है।एक अपने लिए और एक मेरे लिए।मेरे गिलास में उसने कुछ डाला है।वह कह रहा है मसाला है। इससे स्वाद बढ़ जाएगा। अपने जूस में दूसरी पुड़िया से मसाला डाला है। हम दोनों ने जूस पिया है। मुझे स्वाद अच्छा नहीं लगा।बेटू ने गिलास धोकर रख दिए हैं।

      "मां, मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं।आप दरवाजा बंद कर लो।"

      मैं दरवाजा बंद करने के लिए उठती हूं। दरवाजा बंद कर डायरी लिखने बैठ जाती हूं। मुझे हल्के-हल्के चक्कर आ रहे हैं।अब मैं डायरी बंद कर लेट रही हूं।

       इसके आगे के पृष्ठ खाली हैं।यानि बेटू ने ही..... समिधा का दिमाग घूमने लगता है।यानि बेटू यहीं कहीं है और शीघ्र ही आ जाएगा।उसका मन हुआ कि बेटू के आने से पहले डाक्टर और पुलिस के फोन कर दे। मां का पोस्टमार्टम होना चाहिए। मातृहंता को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए।

       अचानक दूसरा ख्याल आया,यदि बेटू सलाखों के पीछे चला जाता है तो उसके परिवार का क्या होगा?और यदि ये सिद्ध नहीं हुआ कि बेटू ही....। वैसे बेटू कम अक्लमंद नहीं है।सारा प्रोग्राम उसने सोच समझकर ही बनाया होगा। मां तो अब लौटकर नहीं आएगी।शायद मां की गति ऐसे ही लिखी थी।सब मां की मौत को स्वाभाविक मान रहे थे। समिधा ने जाकर मां की अलमारी टटोली। मां की चैक बुक, पासबुक और जेवर गायब थे। हां थोड़ी नकदी जरुर रखी थी।

      समिधा का मन हुआ कि सबको चीख चीखकर बता दें कि मां स्वाभाविक मौत नहीं मरी हैं। मां का हत्यारा हुई है।वह अलमारी बंद करके मुड़ी तो पीछे बेटू को खड़े पाया।उसकी आंखों में ऐसा कुछ था जिसे देखकर समिधा सिहर गई।

    "तू इतनी जल्दी पूना से कैसे आ गया बेटू?"

     "मैं तो यहां परसों आ गया था और कल मामाजी के यहां चला गया था। वहीं मां की मृत्यु की सूचना मिली।तू मां की अलमारी में क्या तलाश रही है?"

     "मां की मौत के दस्तावेज"-कहकर समिधा मां की मृत देह के पास जाकर बैठ गई।

 

सुधा गोयल

२९०-ए, कृष्णानगर,डा दत्ता लेन

 बुलंद शहर-२०३००१

उत्तर प्रदेश

 

 

 

 

 

 

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